वट सावित्री व्रत (अमावस्या)
🗓️ ज्येष्ठ अमावस्या (मई–जून)
The story behind वट सावित्री व्रत (अमावस्या)
वट सावित्री व्रत सावित्री उपवास का उत्तर भारतीय रूप है, जो ज्येष्ठ अमावस्या को रखा जाता है — महाराष्ट्र और दक्षिण में मनाई जाने वाली वट पूर्णिमा से पखवाड़ा पूर्व, वही व्रत भिन्न तिथि पर। विवाहित स्त्रियाँ उपवास कर वट वृक्ष का पूजन करती हैं, सावित्री का स्मरण करते हुए, जो यमराज के पीछे चलीं जब वे सत्यवान को ले गए और तब तक नहीं लौटीं जब तक प्राण वापस न मिले। कथा भाग्य की नहीं, संकल्प की है: वे याचना नहीं करतीं, तर्क करती हैं, और यम तर्क स्वीकार करते हैं।
वट सावित्री व्रत (अमावस्या) Puja Vidhi
- 1
स्नान व व्रत संकल्प
प्रातः स्नान कर सौभाग्य अलंकार धारण करें, और सामर्थ्य अनुसार व्रत का संकल्प लें।
- 2
सावित्री-सत्यवान स्थापना
वट वृक्ष की जड़ में सावित्री और सत्यवान की मृण्मूर्तियाँ रखें, अथवा जहाँ वृक्ष समीप न हो वहाँ घर में चित्र के समक्ष।
- 3
वट पूजन व सूत्र वेष्टन
वट वृक्ष को जल, हल्दी, कुंकुम, अक्षत और भीगे चने अर्पित करें, और परिक्रमा करते हुए तने पर कच्चा सूत लपेटें।
- 4
कथा, वायन व पारण
सावित्री कथा सुनें, ज्येष्ठ सुहागिन को वायन दें, और पूजन पूर्ण होने पर व्रत का पारण करें।
वट सावित्री व्रत (अमावस्या) Mantra
ॐ सावित्र्यै नमः॥
Meaning
सावित्री को नमस्कार, जिन्होंने अपने संकल्प से पति को यम से लौटाया।
How to chant
वट वृक्ष पर सूत लपेटते हुए प्रत्येक परिक्रमा पर उच्चारित करें।
