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9. राज विद्या राज गुह्य योग

9. राज विद्या राज गुह्य योग

34 श्लोक

9.1

श्रीभगवानुवाच | इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे | ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेऽशुभात् ||९-१||

śrībhagavānuvāca | idaṃ tu te guhyatamaṃ pravakṣyāmyanasūyave | jñānaṃ vijñānasahitaṃ yajjñātvā mokṣyase.aśubhāt ||9-1||

श्रीभगवान् ने कहा -- तुम अनसूयु (दोष दृष्टि रहित) के लिए मैं इस गुह्यतम ज्ञान को विज्ञान के सहित कहूँगा, जिसको जानकर तुम अशुभ (संसार बंधन) से मुक्त हो जाओगे।।

9.2

राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् | प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम् ||९-२||

rājavidyā rājaguhyaṃ pavitramidamuttamam | pratyakṣāvagamaṃ dharmyaṃ susukhaṃ kartumavyayam ||9-2||

यह ज्ञान राजविद्या (विद्याओं का राजा) और राजगुह्य (सब गुह्यों अर्थात् रहस्यों का राजा) एवं पवित्र, उत्तम, प्रत्यक्ष ज्ञानवाला और धर्मयुक्त है, तथा करने में सरल और अव्यय है।।

9.3

अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप | अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ||९-३||

aśraddadhānāḥ puruṣā dharmasyāsya parantapa | aprāpya māṃ nivartante mṛtyusaṃsāravartmani ||9-3||

हे परन्तप ! इस धर्म में श्रद्धारहित पुरुष मुझे प्राप्त न होकर मृत्युरूपी संसार में रहते हैं (भ्रमण करते हैं)।।

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