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7. ज्ञान विज्ञान योग

7. ज्ञान विज्ञान योग

30 श्लोक

7.1

श्रीभगवानुवाच | मय्यासक्तमनाः पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रयः | असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तच्छृणु ||७-१||

śrībhagavānuvāca | mayyāsaktamanāḥ pārtha yogaṃ yuñjanmadāśrayaḥ | asaṃśayaṃ samagraṃ māṃ yathā jñāsyasi tacchṛṇu ||7-1||

हे पार्थ ! मुझमें असक्त हुए मन वाले तथा मदाश्रित होकर योग का अभ्यास करते हुए जिस प्रकार तुम मुझे समग्ररूप से, बिना किसी संशय के, जानोगे वह सुनो।।

7.2

ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः | यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातव्यमवशिष्यते ||७-२||

jñānaṃ te.ahaṃ savijñānamidaṃ vakṣyāmyaśeṣataḥ | yajjñātvā neha bhūyo.anyajjñātavyamavaśiṣyate ||7-2||

मैं तुम्हारे लिए विज्ञान सहित इस ज्ञान को अशेष रूप से कहूँगा जिसको जानकर यहाँ (जगत् में) फिर और कुछ जानने योग्य (ज्ञातव्य) शेष नहीं रह जाता है।।

7.3मुख्य श्लोक

मनुष्याणां सहस्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये | यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ||७-३||

manuṣyāṇāṃ sahasreṣu kaścidyatati siddhaye | yatatāmapi siddhānāṃ kaścinmāṃ vetti tattvataḥ ||7-3||

सहस्रों मनुष्यों में कोई ही मनुष्य पूर्णत्व की सिद्धि के लिए प्रयत्न करता है और उन प्रयत्नशील साधकों में भी कोई ही पुरुष मुझे तत्त्व से जानता है।।

जीवन में उपयोग

हजारों में से केवल कुछ ही पूर्णता के लिए प्रयास करते हैं। यदि आपके लक्ष्य आपको भीड़ से अलग करते हैं तो निराश न हों। उत्कृष्टता एक दुर्लभ खोज है; अकेले होने पर भी अपने मार्ग पर अडिग रहें।

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