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18. मोक्ष संन्यास योग

18. मोक्ष संन्यास योग

78 श्लोक

18.1

अर्जुन उवाच | संन्यासस्य महाबाहो तत्त्वमिच्छामि वेदितुम् | त्यागस्य च हृषीकेश पृथक्केशिनिषूदन ||१८-१||

arjuna uvāca | saṃnyāsasya mahābāho tattvamicchāmi veditum | tyāgasya ca hṛṣīkeśa pṛthakkeśiniṣūdana ||18-1||

अर्जुन ने कहा -- हे महाबाहो ! हे हृषीकेश ! हे केशनिषूदन ! मैं संन्यास और त्याग के तत्त्व को पृथक्-पृथक् जानना चाहता हूँ।।

18.2

श्रीभगवानुवाच | काम्यानां कर्मणां न्यासं संन्यासं कवयो विदुः | सर्वकर्मफलत्यागं प्राहुस्त्यागं विचक्षणाः ||१८-२||

śrībhagavānuvāca | kāmyānāṃ karmaṇāṃ nyāsaṃ saṃnyāsaṃ kavayo viduḥ | sarvakarmaphalatyāgaṃ prāhustyāgaṃ vicakṣaṇāḥ ||18-2||

श्रीभगवान् ने कहा -- (कुछ) कवि (पण्डित) जन काम्य कर्मों के त्याग को "संन्यास" समझते हैं और विचारशील जन समस्त कर्मों के फलों के त्याग को "त्याग" कहते हैं।।

18.3

त्याज्यं दोषवदित्येके कर्म प्राहुर्मनीषिणः | यज्ञदानतपःकर्म न त्याज्यमिति चापरे ||१८-३||

tyājyaṃ doṣavadityeke karma prāhurmanīṣiṇaḥ | yajñadānatapaḥkarma na tyājyamiti cāpare ||18-3||

कुछ मनीषी जन कहते हैं कि समस्त कर्म दोषयुक्त होने के कारण त्याज्य हैं; और अन्य जन कहते हैं कि यज्ञ, दान और तपरूप कर्म त्याज्य नहीं हैं।।

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