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16. दैवासुर संपद विभाग योग

16. दैवासुर संपद विभाग योग

24 श्लोक

16.1मुख्य श्लोक

श्रीभगवानुवाच | अभयं सत्त्वसंशुद्धिर्ज्ञानयोगव्यवस्थितिः | दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम् ||१६-१||

śrībhagavānuvāca | abhayaṃ sattvasaṃśuddhirjñānayogavyavasthitiḥ | dānaṃ damaśca yajñaśca svādhyāyastapa ārjavam ||16-1||

श्री भगवान् ने कहा -- अभय, अन्त:करण की शुद्धि, ज्ञानयोग में दृढ़ स्थिति, दान, दम, यज्ञ, स्वाध्याय, तप और आर्जव।।

जीवन में उपयोग

निर्भयता, हृदय की पवित्रता, और ज्ञान प्राप्त करने में दृढ़ता दिव्य गुण हैं। डर से बचकर नहीं, बल्कि हाथ कांपने पर भी सही कार्रवाई करके साहस पैदा करें।

16.2

अहिंसा सत्यमक्रोधस्त्यागः शान्तिरपैशुनम् | दया भूतेष्वलोलुप्त्वं मार्दवं ह्रीरचापलम् ||१६-२||

ahiṃsā satyamakrodhastyāgaḥ śāntirapaiśunam | dayā bhūteṣvaloluptvaṃ mārdavaṃ hrīracāpalam ||16-2||

अहिंसा, सत्य, क्रोध का अभाव, त्याग, शान्ति, अपैशुनम् (किसी की निन्दा न करना), भूतमात्र के प्रति दया, अलोलुपता , मार्दव (कोमलता), लज्जा, अचंचलता।।

16.3

तेजः क्षमा धृतिः शौचमद्रोहो नातिमानिता | भवन्ति सम्पदं दैवीमभिजातस्य भारत ||१६-३||

tejaḥ kṣamā dhṛtiḥ śaucamadroho nātimānitā | bhavanti sampadaṃ daivīmabhijātasya bhārata ||16-3||

हे भारत ! तेज, क्षमा, धैर्य, शौच (शुद्धि), अद्रोह और अतिमान (गर्व) का अभाव ये सब दैवी संपदा को प्राप्त पुरुष के लक्षण हैं।।

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