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13. क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

13. क्षेत्र क्षेत्रज्ञ विभाग योग

34 श्लोक

13.1

अर्जुन उवाच | प्रकृतिं पुरुषं चैव क्षेत्रं क्षेत्रज्ञमेव च | एतद्वेदितुमिच्छामि ज्ञानं ज्ञेयं च केशव ||१३-१||

arjuna uvāca | prakṛtiṃ puruṣaṃ caiva kṣetraṃ kṣetrajñameva ca | etadveditumicchāmi jñānaṃ jñeyaṃ ca keśava ||13-1||

अर्जुन ने कहा -- हे केशव ! मैं, प्रकृति और पुरुष, क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ तथा ज्ञान और ज्ञेय को जानना चाहता हूँ।।

13.2

श्रीभगवानुवाच | इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते | एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः ||१३-२||

śrībhagavānuvāca | idaṃ śarīraṃ kaunteya kṣetramityabhidhīyate | etadyo vetti taṃ prāhuḥ kṣetrajña iti tadvidaḥ ||13-2||

श्रीभगवान् ने कहा -- हे कौन्तेय ! यह शरीर क्षेत्र कहा जाता है और इसको जो जानता है, उसे तत्त्वज्ञ जन, क्षेत्रज्ञ कहते हैं।।

13.3

क्षेत्रज्ञं चापि मां विद्धि सर्वक्षेत्रेषु भारत | क्षेत्रक्षेत्रज्ञयोर्ज्ञानं यत्तज्ज्ञानं मतं मम ||१३-३||

kṣetrajñaṃ cāpi māṃ viddhi sarvakṣetreṣu bhārata | kṣetrakṣetrajñayorjñānaṃ yattajjñānaṃ mataṃ mama ||13-3||

हे भारत ! तुम समस्त क्षेत्रों में क्षेत्रज्ञ मुझे ही जानो। क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ का जो ज्ञान है, वही (वास्तव में) ज्ञान है , ऐसा मेरा मत है।।

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