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11. विश्वरूप दर्शन योग

11. विश्वरूप दर्शन योग

55 श्लोक

11.1

अर्जुन उवाच | मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम् | यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम ||११-१||

arjuna uvāca | madanugrahāya paramaṃ guhyamadhyātmasaṃjñitam | yattvayoktaṃ vacastena moho.ayaṃ vigato mama ||11-1||

अर्जुन ने कहा -- मुझ पर अनुग्रह करने के लिए जो परम गोपनीय, अध्यात्मविषयक वचन (उपदेश) आपके द्वारा कहा गया, उससे मेरा मोह दूर हो गया है।।

11.2

भवाप्ययौ हि भूतानां श्रुतौ विस्तरशो मया | त्वत्तः कमलपत्राक्ष माहात्म्यमपि चाव्ययम् ||११-२||

bhavāpyayau hi bhūtānāṃ śrutau vistaraśo mayā | tvattaḥ kamalapatrākṣa māhātmyamapi cāvyayam ||11-2||

हे कमलनयन ! मैंने भूतों की उत्पत्ति और प्रलय आपसे विस्तारपूर्वक सुने हैं तथा आपका अव्यय माहात्म्य (प्रभाव) भी सुना है।।

11.3

एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर | द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तम ||११-३||

evametadyathāttha tvamātmānaṃ parameśvara | draṣṭumicchāmi te rūpamaiśvaraṃ puruṣottama ||11-3||

हे परमेश्वर ! आप अपने को जैसा कहते हो, यह ठीक ऐसा ही है। (परन्तु) हे पुरुषोत्तम ! मैं आपके ईश्वरीय रूप को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।।

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