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10. विभूति योग

10. विभूति योग

42 श्लोक

10.1

श्रीभगवानुवाच | भूय एव महाबाहो शृणु मे परमं वचः | यत्तेऽहं प्रीयमाणाय वक्ष्यामि हितकाम्यया ||१०-१||

śrībhagavānuvāca | bhūya eva mahābāho śṛṇu me paramaṃ vacaḥ | yatte.ahaṃ prīyamāṇāya vakṣyāmi hitakāmyayā ||10-1||

श्रीभगवान् ने कहा -- हे महाबाहो ! पुन: तुम मेरे परम वचनों का श्रवण करो, जो मैं तुझ अतिशय प्रेम रखने वाले के लिये हित की इच्छा से कहूँगा।।

10.2

न मे विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः | अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः ||१०-२||

na me viduḥ suragaṇāḥ prabhavaṃ na maharṣayaḥ | ahamādirhi devānāṃ maharṣīṇāṃ ca sarvaśaḥ ||10-2||

मेरी उत्पत्ति (प्रभव) को न देवतागण जानते हैं और न महर्षिजन; क्योंकि मैं सब प्रकार से देवताओं और महर्षियों का भी आदिकारण हूँ।।

10.3

यो मामजमनादिं च वेत्ति लोकमहेश्वरम् | असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते ||१०-३||

yo māmajamanādiṃ ca vetti lokamaheśvaram | asammūḍhaḥ sa martyeṣu sarvapāpaiḥ pramucyate ||10-3||

जो मुझे अजन्मा, अनादि और लोकों के महान् ईश्वर के रूप में जानता है, र्मत्य मनुष्यों में ऐसा संमोहरहित (ज्ञानी) पुरुष सब पापों से मुक्त हो जाता है।।

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